“हिंदी की किताब क्यों पढ़ रही है बे?!”: क्यों हमारा Elite समाज देसी को Uncool समझता है

Social Commentary

“हिंदी की किताब क्यों पढ़ रही है बे?!”: क्यों हमारा Elite समाज देसी को Uncool समझता है

Illustration: Akshita Monga

मु

झे आज भी याद है, स्कूल का वह दिन जब लाइब्रेरी के पीरियड में मैंने हार्डी बॉयज और रस्किन बांड की क़िताबों के ढेर में से, प्रेमचंद की कहानियों की एक क़िताब उठाई थी| जब उस क़िताब को लेकर मैं पढ़ने बैठी, तो मेरी एक सहेली, या यूँ कहें की मेरी एक प्रतिद्वंद्वी सहपाठी, हसते हुए बोली, “ये क्या, हिंदी की किताब?!” उसके “हिंदी” बोलने में उतना ही प्रेम था जितना मोदी जी के “गाँधी” बोलने में, या किसी चाय के शौकीन के “कॉफ़ी” बोलने में होता है |

हाँ, हिंदी की ही क़िताब है,” कहते ही मैंने अपनी नज़र उस सहपाठी की मुझे नीचा दिखाती मुस्कराहट से “कफ़न” की गंभीरता की ओर लगा दी| “तुम्हें इतनी सारी किताबों में बस यही किताब मिली?” वह फिर अपने तीख़े स्वर में बोली| अब बारी मेरी थी| बड़े ही सजीव हाव-भाव के साथ मैंने जवाब दिया, “हामिद का नाम तो सुना होगा तुमने? प्रेमचंद की ही कहानी ईदगाह का क़िरदार है| हर किसी ने सुनी है, तुमने नहीं सुनी?” उसके पास कोई जवाब नहीं था |“तभी मैं सोचूं, विश्व के सबसे अच्छे कहानीकार की कहानियों को पढ़ने पर तुम इतनी हैरान क्यों हो,” और यही कहते हुए मैंने अपना ध्यान वापिस “कफ़न” की पेचीदगी परखने में लगा दिया|

यह “आधे अंग्रेज़ से” मेरी पहली मुलाक़ात थी|

यह आधा अंग्रेज़ बड़ा विचित्र प्राणी होता है| एक तरफ तो इसे हर भारतीय चीज़, इंसान और जगह से चिढ़ होती है, वहीं दूसरी तरफ़, यह अपने मनपसंद headphones खरीदने के लिए Flipkart की Big Billion Day sale का इंतज़ार साल भर बेसब्री से करता है| एक तरफ़ इसकी ज़ुबान से अंग्रेजी के शब्द गंगा नदी की रवानी से यूँ बहे जाते हैं कि अंग्रेज़ भी देखकर शायद हैरान रह जाएं, वहीं दूसरी तरफ़, जैसे ही इसका गुस्सा साँतवे माले पर पहुँचता है, वैसे ही इसकी वाणी में “तेरी माँ की” व “तेरी बहन की” जैसे मधुर कथन मिश्री से घुल जाते हैं| एक तरफ़ इसके फ़ोन में इंटरनेट से उठाये हुए GIFs व cat memes के लिए जगह कम पड़ती है, दूसरी तरफ़ इसे समझ नहीं आता कि बड़े लोग WhatsApp forwards क्यों भेजते रहते हैं|

कहने वाले कह सकते हैं, कि यह आधा अंग्रेज़ बाहर से जितना आश्वस्त, जितना सुसंस्कृत, हमारी भाषा में कहें तो जितना woke जान पड़ता है, अंदर से उतना ही व्याकुल, उतना ही घबराया सा रहता है, मानो संस्कृतिओं की ऊन में यह अपनी ही पहचान उलझा बैठा हो| यह बात मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता | इतने सालों में मेरा इतने आधे अंग्रेज़ों से पाला पड़ा है कि मैं ख़ुद आधी अंग्रेज़ बन बैठी हूँ |

मैं मध्यमवर्गीय बालिका हूँ, यानि middle-class child| मेरा जन्म ऐसे युग, ऐसे देश, ऐसे परिवार में हुआ जहाँ technology  के नाम पर बस घर के उपकरण और हमारा बजाज ही था| मेरे woke दोस्तों की तरह मैं ना Tolkien, और ना ही Roald Dahl पढ़ते हुए बड़ी हुई| मेरे माता-पिता, दो साधारण सरकारी सेवक, novels पढ़ने को पढाई से भटकना समझते थे | मुझे याद है, जिस दिन मैं पहली दो Harry Potter की किताबें घर लाई थी, उस दिन गणित और विज्ञान के तहख़ानों को छोड़, मैं Hogwarts के रहस्यमयी तहख़ानों में ग़ुम हो गयी थी| ज़ाहिर सी बात है, मेरी माँ को ये बात कतई पसंद ना आई, और उस दिन के बाद से Harry और उसके दोस्तों के साथ साथ, किसी भी और novel का हमारे घर आना बंद हो गया |

उसके “हिंदी” बोलने में उतना ही प्रेम था जितना मोदी जी के “गाँधी” बोलने में|

पर पढ़ने का शौक बंद नहीं हुआ | इसलिए घर में जो मिलता मैं वह पढ़ लेती – Hindu के editorials, पापा की राजनैतिक पत्रिकाएँ, उनकी डायरी में चिपकी क़िताबों और अख़बारों की कट्टिंग्स, और कथा-साहित्य से जुड़ी उनकी इकलौती पत्रिका जो हर महीने हमारे दरवाज़े पर दस्तक देती थी – “हंस”, जिसकी स्थापना सन 1930 में ख़ुद मुंशी प्रेमचंद ने इस विचार के साथ की थी कि साहित्य के माध्यम से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भारतीयों को एक किया जा सके, और जिसे राजेंद्र यादव नाम के एक लेखक ने 1986 में पुनः जीवित किया था | हंस के पन्नों में मेरा परिचय हुआ कुछ अनजाने और कुछ जाने-माने हिंदी लेखकों से – रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत इत्यादि, जिनके नाम हम में से कई लोगों ने स्कूल के हिंदी syllabus में पढ़े होंगे, लेकिन जिनके बारे में याद आज हम में से कुछ ही को है| हंस के क़िस्से, कहानिओं, और कविताओं में ही मेरा पहला परिचय हुआ संस्कृति से – देसी संस्कृति से|

मोहब्बत की जुदाई का ग़म, मैंने पहली बार Eliot के शब्दों में नहीं, शिव कुमार बटालवी के गीतों में जाना| बटालवी के प्यार में जिस्म की चाह भी थी और देशप्रेम भी.  “झुण्ड आये और गए महबूबों के,” उन्होंने लिखा, “पर मैं ना भुला पाया झाँग की धरती को|” “लोग मेरे गीत भी सुनते हैं, और मुझे काफ़िर कह कर ज़लील भी करते हैं|” आज, जब bollywood का कोई गाना, चाहे वो “इक कुड़ी” हो या “अज्ज दिन चढ़ेया”, प्रसिद्घ होता है, तब मैं अपने बचपन के उस छोटे से भाग को याद कर कुछ आनंद और कुछ ग़रूर से भर उठती हूँ|

17 की उम्र में मुझे इंटरनेट मिला, और शुरू हुआ मेरे जीवन का एक नया दौर| संगीत में मेरी पसंद Linkin Park से शुरू होते हुए Coldplay, Pink Floyd, Radiohead और Daft Punk से आगे ही बढ़ती रही, और छूट गयी ग़ुलाम अली और जगजीत सिंह की दर्द-भरी राहें, मन्ना डे, और RD बर्मन की बहुमुखी प्रतिभा, मेहदी हस्सन और नुसरत फ़तेह अली ख़ान की सूफ़ी शायरी| साल दर साल, मेरे नय दोस्त बनते गए और उनमें से किसी ने इन हस्तियों के बारे में नहीं सुना था| कुमार सानू का नाम उनके लिए एक मज़ाक था | “तेरा मेरा प्यार” और “सोचेंगे तुम्हें प्यार” का वो माधुर्य, जिसने मेरे किशोर मन को कभी रोमांस का मतलब समझाया था, मैंने अपनी यादों में ही दफ़ना दिया, और अपने woke दोस्तों के साथ उनके चुटकुलों पर हस्ती रही|

जहाँ मेरे स्कूल की छात्राएं Titanic के गुण-गान करती न थकती थीं, मै घर जाकर “साजन” में संजय दत्त को माधुरी दीक्षित के लिए तड़पते देखने का इंतज़ार करती थी| मनोरंजन के लिए मैं Toy Story या Willy Wonka’s Chocolate Factory नहीं, बल्की बावर्ची और हाथी मेरे साथी देखती थी| संजीदा या प्रेरणाशाली सिनेमा के नाम पर मैं Godfather या Shawshank Redemption नहीं, बल्कि गाइड, आनंद, और अभिमान जैसी फ़िल्में देखना पसंद करती थी| अब सब सच बोल रही हूँ to आज यह भी स्वीकार कर लेती हूँ, कि मेरी favorite फ़िल्में मेरा नाम जोकर और अर्थ हैं, न कि Pulp Fiction या Taxi Driver जिसका दावा मैंने कभी किया था|

सच तो यह है, की इंटरनेट पर आने के कुछ ही सालों में मैं समझ गई थी कि जो cool थे वे भारतीय कला, साहित्य, सिनेमा इत्यादि की बात नहीं कर रहे थे, और जो इन सब के बारे में बात कर रहे थे, वे cool नहीं थे| आम विचारधारा यह थी की पश्चिमी कला, साहित्य, सिनेमा इत्यादि पेचीदा हैं, असाधारण हैं, इसलिए इनकी जानकारी रखने वाला प्राकृतिक रूप से अधिक सक्षम एवं अधिक बुद्धिमान होगा| मेरे हिसाब से सच यह है कि हम में से ज़्यादातर लोग जो नोलन और टैरेन्टीनो के fan होने का दावा कर रहे थे, वो या तो एक तरह का ढोंग कर रहे थे, या सब में घुलने-मिलने की एक कोशिश| यह कोशिश मैंने भी की, और यह करना बहुत आसान भी था| इंटरनेट मेरी तरफ इतने अमरीकी कार्यक्रम, फिल्में इत्यादि धकेल रहा था कि शबाना आज़मी या सादत हसन मंटो या मोहम्मद रफ़ी के पास वापिस जाने का तो मुझे मौक़ा ही नहीं मिला|

मुझे लगता है कि यह बात मेरी पीढ़ी पर ज़्यादा लागू होती है – जिसका इंटरनेट से परिचय कुछ देर से हुआ – आज के digital निवासिओं का अनुभव शायद ऐसा नहीं रहा होगा| एक वक़्त ऐसा भी था जब मैं सोचती थी कि क़ाश, मेरी यह “तरक्की” कुछ जल्दी हुई होती, कि क़ाश खेलने की जग़ह मुझे अमरीकी novels पढ़ने की अनुमति मिली होती, कि क़ाश अपने किशोरी वर्षों में, मुझे पापा की कैसेट टेप्स की जग़ह इंटरनेट के विकासशाली साधन मिले होते| यह ख़ेद, यह पछतावे मैं सिर्फ़ इसलिए रखती थी क्योंकि मैं ख़ुद को सांस्कृतिक रूप से बेख़बर, लगभग अनपढ़ समझ बैठी थी, समझ बैठी थी कि जो पश्चिमी फ़िल्म, संगीत, साहित्य इत्यादि की दुनिया से परिचित नहीं वो cultured ही नहीं|

इतने साल अपनी इस आधी अंग्रेज़ और आधी हिंदी-भाषी प्रकृति से जूझने के बाद मैंने यही सीखा है कि संसार के हर हिस्से की संस्कृति के बारे में कुछ-कुछ जानने में अलग ही आनंद है| आज मैं Coltrane, Mingus, और Brubeck के jazz संगीत को उतने ही उत्साह से सुनती हूँ जितने उत्साह से मैं शंकर-जयकिषन के कम-प्रसिद्ध हिंदुस्तानी रागों के jazz renditions को सुनती हूँ| इसी दोहमुखी दिलचस्पी की बदौलत मैंने अब जाकर अपने इस आधे-अंग्रेज़पने का अभिनंदन किया है|

मुझे ग़लत मत समझना, मैं उनमें से नहीं जो भारतीय संस्कृति के नाम पर विश्व के कोने-कोने में पनपी कला-रुपी संस्कृतिओं को कम आंकते हैं या उसका तिरस्कार करते हैं, पर मैं इतना ज़रूर कहूँगी कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने में भी एक संतोष है| शायद अगर हम सब आधे अंग्रेज़, हम आज के युग के भारतीय millennial elite, अपना कुछ समय धरती के इस हिस्से में जन्मे इतिहास, इस देश और आसपास की फ़िल्मों, संगीत, साहित्य इत्यादि को जानने या पढ़ने में लगाएंगे, तो शायद हम उन  मानसिक असुरक्षाओं से मुक्त हो जाएंगे जिनके कारण हम ख़ुद को कम या फिर uncool समझते हैं | तो जाईये, प्रेमचंद पढ़िए और शौक से भारी discount वाले वो headphones ख़रीदिये|

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