सीटों का गुंडाराज

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सीटों का गुंडाराज

Illustration: Mudit Ganguly

सु

बह 7:24 की चर्चगेट जाने वाली लोकल में नालासोपारा से चढ़ने का अनुभव कुछ ऐसा है, जैसे आपको एक गरमा-गरम मालिश मिल रही हो। पर कोमल हाथों से नहीं, पसीने में सने घने बालों वाले हाथों से। ऐसा लगता है सब एक विशालकाय आटे में गूँथे जा रहे हों, पर आपको अंदर कोई नहीं चाहता। आपके पास ज़्यादा विकल्प नहीं हैं, सिवाय बची कुछ जगह में किसी तरह समाने के, या दरवाज़े पर लटककर अग्निपथ कहलाने के।

मुझे दोनों से ही दिक्कत थी, तो मैंने किसी शुभचिंतक की बात मानी और “उल्टा चढ़ो” का नारा अपना लिया। मैंने जब ये पहली बार सुना था तो मुझे कतई नहीं लगा था कि इसके वो मायने होंगे जिनसे मैं आज भी इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ। खैर, इसका मतलब होता है कि आपको जिस तरफ जाना है उससे उलटी दिशा में ट्रेन पकड़ो, ताकि जब वो वापस आ रही हो तो शायद आपको सीट मिल जाये। अगर आपको ये सुनने में अटपटा लग रहा है तो आप इस शहर से वाकिफ़ नहीं हैं जिसका नाम मुम्बई है, यानि आप हमारे मेहमान हैं। आपका स्वागत है।

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