टिंडर वाले बाबू मेरा खाता चला दो!

Love and Sex

टिंडर वाले बाबू मेरा खाता चला दो!

Illustration: Sushant Ahire

द का चाँद साल में दो बार निकलता है, फिर भी उसे “नायाब” कह दिया जाता है । पर मेरी नम्र राय में “नायाब” उन मौक़ों पर इस्तेमाल होना चाहिये जो कई सालों में एक बार आएँ, जैसे अच्छे दिन आएँगे तो नायाब मौक़ा होगा ।

कहते हैं किसी के भी नाम का असर सीधे-सीधे उसकी शख़्सियत पर पड़ता है । शायद इसीलिए फ़ोन को अब स्मार्ट्फ़ोन कहा जाने लगा है । स्मार्ट इसीलिए क्योंकि “You got a new match” के आगे जो आँखों में दिल वाला गुड्डा बना होता है, वो आपको आपसे ज़्यादा जानता है ।

पहले कभी ध्यान नहीं दिया था, पर टिंडर पे जब मैच आता है तो notification की घंटी Facebook Messenger जैसी नहीं होती, बल्कि थोड़ी अलग होती है । हालाँकि मुझे कोई देख नहीं रहा था पर मैंने फुल एक्टिंग की, कि जैसे ऐसे notification तो मेरा रोज़ का है । पर उसी सुरीली आवाज़ में जब एक और घंटी बजी, तो लगा की कहीं घर आई लक्ष्मी रूठकर ना चली जाए ।

आपको क्या लगा, मेरा मैच पहली बार आया था? जी नहीं । और नायाब ये नहीं था कि मैच आया था, नायाब ये था कि मैच के बाद सामने से संदेसा आया था ।

“Hi,” दिल गद्दगद्द हो गया । पर कहीं ये उनमें से तो नहीं जो “Be creative to start the conversation” का दबाव पहले ही बना देती हैं ? 1 Like, 1 Respect । फोटो तीन थे और एक ही लड़की के थे, मतलब सब ठीक था । नाम था “निरवी” । इस नाम में छुपा, शायद ऊपर वाले का कुछ इशारा रहा होगा । पर इतना ध्यान कहाँ देता है कोई ?

मैंने मन बना लिया था कि जब सामने से ज़रिया आ रहा है तो मैं नेकी के काम में पीछे क्यों हटूँ ।

Hi का जवाब Hello से दे दिया गया । नाम का मतलब पूछ ही रहा था कि सामने से एक और सन्देश, “How are you dear?” । Catfishing का शक और गहरा हो गया; अब multitasking का टाइम था । इधर चैट चालू रखी और उधर लैपटॉप पर Facebook पर नाम search किया । तीसरे नम्बर पे ही तस्वीर मेल खा गई । पूरा नाम था निरवी वाडिया । बिना कोई दम लगाए ही अपनी बिरयानी को दम लग रहा था । मेरे भी मुँह में पानी आ गया ।  हालाँकि सच कहूँ तो एक बार ज़हन में आया भी, “इतनी खूबसूरत लड़की ने पिछले दो सालों में फोटो क्यों नहीं बदली होगी?” ।

पर बिरयानी में इलाइची किसको पसंद होती है ? मैंने भी थूक दी क्योंकि उधर निवाले पे निवाले आ रहे थे ।

मालूम चला कि मोहतरमा पेशे से jewellery designer हैं और शौक़ से social worker । अपने दिल के 4 में से 1 चेम्बर में, पेशे और शौक़ की कश-म-कश के बीच पिसने वालों के लिए ख़ास जगह है । इज़्ज़त और उम्मीद दोनों बढ़ गए । जब आपके सामने कोई अच्छा इंसान हो न तो आपकी भी इंसानियत फूट-फूट कर बाहर आने लगती है । मुझे भी लगा कि कितनी शालीन, भली, नेकदिल लड़की है । वरना टिंडर पे कहाँ बच्चों के NGO के बारे में बात होती है, टिंडर पे तो “show bobs and vagene” का राज चलता है ।

Real time में इतनी ज़िंदा-दिल चैटिंग तो मैंने कभी WhatsApp पे भी नहीं की था जैसी मैं टिंडर पर कर रहा था । पर कुछ देर बाद मैं भी बोर हो गया, सोचा बहुत हो गई समाज सेवा, क्यों न कुछ और बात की जाए । पर जैसे जैसे मैं बात को मोड़ ने की कोशिश करता जाऊँ, वैसे वैसे वो गोल घूम कर वापस आ जाये । मुझे भी कुछ अपराध-बोध महसूस हुआ और मेरे भीतर का रामाधीर, मेरे और भीतर के जे.पी. को डांटने लगा: की ये होता है जज़्बा अपने passion को फॉलो करने का, सीखो कुछ ।

इस बार सामने से प्रस्ताव था कि क्या मैं भी ऐसे किसी काम में रुचि रखता हूँ ? अजी मैंने तपाक से हामी भर दी । और फिर बात चली दान करने की।

यक़ीन जानिए मैं इस क़दर भूमिका में रम चुका था कि मुझे समझ नहीं आया कि क्या दान करने की बात हो रही है ? शरीर का कोई अंग, ख़ून, या पैसा ? “Haha! Some amount you silly boy” । क्यूट तो बहुत लगा पर इस बार बिरयानी में इलाइची नहीं थी, दाँतों के बीच कमबख़्त मिर्च आ फँसी थी – वो भी काली । मतलब आप किसी से पिछले दो घंटों से बात कर रहे हो और पैसों की बात बीच में आ जाये तो…

मैं काफ़ी मायूस हो गया । पर उसके साथ बातचीत Boomerang का रंग ले चुकी थी । अपनी ही बात को जारी करते हुए, उसने कहा, “उत्तरकाशी में हमारा कैंप है दो हफ्ते बाद से, तो हम उसके लिए पैसे इकट्ठा कर रहे हैं” । फिर से शर्मिंदगी ने घेर लिया । मेरी वासनायें उपासनायें बन गई – बमुश्किल इस नापाक ख़याल को निकाल कर फ़ेंक दिया कि चलो डेट पे महँगी कॉफ़ी पिलाने से अच्छा है उत्तरकाशी में किसी बच्चे के दिमाग का tumour ही ठीक हो जाये ।

अब तक मैं अच्छा बच्चा बन चुका था । मैंने मन बना लिया था कि जब सामने से ज़रिया आ रहा है तो मैं नेकी के काम में पीछे क्यों हटूँ । हालाँकि महीने का अख़ीर था तो मैंने बड़ा हिचकिचाते हुए, शब्द टटोल कर कहे, “Minimum amount (न्यूनतम राशि) कितना दे सकते हैं?” । ग़ौर से देखा जाये तो इस सवाल में “minimum” शब्द ख़ुद में ही काफ़ी मातम करता हुआ पाया जा रहा है । पर बैटमैन उसने भी देखी थी: “कोई लिमिट नहीं है, जितना आपको ठीक लगे” । वो भी शब्दों में खेल गई ।

अब जब टिंडर पे बात किया तो judgment से डरना क्या? मैंने बिना कुछ तीन पांच किये 500 के आगे “?” बना दिया । और ऊपर वाला जानता है कि 29 तारीख़ को ऐसा कोई नाज़ुक फैसला लेना कितना दुखद हो सकता है । पर दुखद तो ये था कि आज सारे खड़े मसाले मेरी ही प्लेट में थे । तेज पत्ता भी आ ही गया जब उसने “1,000” कहते हुए एक गुड्डा चिपका दिया ।

मैं बिरयानी में तेज़ी से अच्छी बोटियाँ ढूंढने लगा क्योंकि हर निवाले के साथ मुँह कड़वा होता जा रहा था और ऐसे वक़्त में लौंग से मुझे सख़्त नफ़रत है ।

“ठीक है । कल ले लो । बताओ कहाँ मिलोगी?” मैंने भी सोचा कि अगर मेरा कोई दोस्त मुझे इसके साथ घुमते हुए देख ले तो सौदा कतई महँगा नहीं है । दोस्तों के WhatsApp group पर उसके ज़िक्र भर से पैसे वसूल हो जायेंगे । ऊपर से 1,000 रुपये की भारी धनराशि जो उत्तरकाशी में बच्चों का उद्धार करेगी, वो अलग ।

पर वही हुआ जिसका डर था ।

“Let’s meet after I am back from camp. Really busy these days.” कह कर साथ मेरी प्रत्याशित टिंडर डेट ने एक नंबर भेजा और पैसा PayTM करने को बोला । मेरे पाँव तले ज़मीन खिसक गई । इसलिए मैंने इस बार लौंग नहीं, पूरा निवाला ही थूक दिया ।

मैंने तीनों तस्वीरों को उठाकर Google image की चरणों में रख दिया । परिणाम में रायता मिला जो बिरयानी पर फैल चुका था । तीनों ही तस्वीरें दरअसल किसी पाकिस्तानी TV industry में struggle कर रही एक्ट्रेस की थीं ।

मुझे याद आने लगा कि कैसे घर पर मेरे पापा ने अपना ATM कार्ड बंद करवा दिया है क्योंकि आये-दिन अख़बारों में कहीं दूर बड़े शहर के ATM से पैसे निकाल लेने कि ख़बरें छपती रहती हैं । कैसे लोगों को फोन आते हैं और कोई कहानी बनाकर उनका कार्ड नंबर और पिन पूछ ले जाता है । “जानिए कैसे मैंने खरीदी चार महीनों में अपने सपनों की गाड़ी और हर दिन कमायें 8 से 10 हज़ार रुपये” के विज्ञापन websites/apps में उभरते रहते हैं । हो ना हो, ये भी उसी किचन से निकला हुआ पकवान था ।

फ़र्क़ बस इतना था कि ये टिंडर का तंदूर था, जिसमें बिरयानी छोटे शहरों जैसे गोबर के उपलों की नंगी आंच पर हांडी में नहीं, बल्कि metropolis के microwave oven की sophisticated गरमी से non-sticky पैन में पकती है । मद्धम मद्धम ।

अब बारी मेरी थी । पर मेरी ट्रेनिंग उसके जैसी कहाँ ? मैंने चैट screenshot और नंबर ले जाकर थाने में जमा करा दिए । पर जितना वक़्त मेरे पास ज़िम्मेदार नागरिक बनने का था, उतना तो मुझे दरोगा जी को ये समझाने में ही खर्च हो गया कि टिंडर आख़िर है क्या ! पूरी तरह खुल के समझा भी नहीं सकता था ।

कहते हैं अक़्ल आपके पीछे होती है, इसलिए आपके रुकने के बाद ही आती है । मैं ये सोचकर काफ़ी जज़्बाती हो चुका था कि शायद पूरा वक़्त वहां कोई निरवी नहीं नीरव रहा होगा । जब कुछ दिन बाद नीरव मोदी पैसे लेकर फ़रार हो गया, तब यक़ीन और पुख़्ता हो गया कि वाकई नाम का असर होता है ।

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