म्हारा भैंसा बेटे जैसा

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म्हारा भैंसा बेटे जैसा

Illustration: Akshita Monga

ब होरी गाय घर लाया था तो धनिया ने बित्ते भर के आँगन में नाँद इसलिए गड़वायी थी कि इतनी सुन्दर गाय को देखकर गाँववालो के मन में खोट न आ जाये। हिंदी के महानतम रचयिता प्रेमचंद की कृति “गोदान” में ऐसे कई अंश हैं जिनको पढ़ के एक पालतू पशु की जीवन से बड़ी तस्वीर उभरकर सामने आती है।

डिडवाड़ी गाँव के नरेंद्र सिंह पूनिया के पास गाय नहीं हैं पर मुर्रा भैंसो का एक बाड़ा ज़रूर है। अब उनकी कृषक पृष्ठभूमि के चलते यकीन से कह नहीं सकते कि उन्होंने प्रेमचंद पढ़ा है कि नहीं, पर अगर जान पाते तो होरी उन्हें अपने किसी दूर के रिश्तेदार जैसा लगता।

मैं पूनिया से उनके गाँव डिडवाड़ी में जब मुखातिब होता हूँ तो वो अपने खूबसूरत शहंशाह की मालिश में व्यस्त हैं। एग्री लीडरशिप समिट 2017 का स्टार आकर्षण और उत्तर प्रदेश पशु सौंदर्य प्रतियोगिता 2016 का विजेता शहंशाह, उनका करीब डेढ़ टन का जवान मुर्रा भैंसा है जो 5’10” ऊँचा और नाक से लेकर पूँछ तक 15’5″ लम्बा है।

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