शादी के बाद क्या क्या हुआ?

Social Commentary

शादी के बाद क्या क्या हुआ?

Illustration: Namaah/ Arré

मैं

एक लंबी कतार में खड़ा हुआ हूँ । आपकी तरह मुझे भी कतारें बिल्कुल पसंद नहीं हैं, पर आज एक अज़ीज़ दोस्त के भाई की शादी है और खाने में मटन रोगनजोश है । रोगनजोश और दुल्हन की सहेलियां इस शादी का खास आकर्षण हैं । मैंने जब रोगनजोश देने वाले से एक और पीस माँगा, उसने छोटी इलाइची से थोड़ा बड़ा पर बड़ी इलाइची से काफ़ी छोटा, एक टुकड़ा मेरी प्लेट पर डाल दिया ।

मेरे पीछे दूल्हे के चार दोस्त खड़े हैं, जिनको अभी भी ये लगता है कि इनके अलावा किसी को नहीं पता कि ये पेप्सी नहीं व्हिस्की पी रहे हैं । चारों दूल्हे की सेक्स लाइफ में आने वाले बदलाव के बारे में बात कर रहे हैं और इस मुद्दे में जितना मसाला है मुझे नहीं लगता आज रात ये किसी और बारे में बात करेंगे। पहले दोस्त के शादी को लेके विचार बेहद रोचक हैं, उसकी माने तो – “शादी मतलब सेक्स” । दूसरे दोस्त के लिए शादी का मतलब सेक्स तो है, पर प्यार के साथ । तीसरे की नज़र ज़रा पैनी है, वो समझाने में लगा है की दूल्हे और दुल्हन की लंबाई का फ़र्क, कैसे सेक्स को पूरी तरह से बदल के रख देता है ।

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पर वो चौथे की बातें थीं जो मुझे ये किस्सा आज तक याद है । चौथे ने कहा कि ये सारी बातें धरी की धरी रह जाएंगी जब ये सेक्स महज़ एक 10 x 12 के तहखाने में पांच अन्य लोगो की हाज़री में होगा। वो भी किस्मत अच्छी रही तो पांच, वर्ना आठ-दस तो कहीं नहीं गए । ये बात ज़हन में आते ही आपका सारा जोश “लौटके नहीं आऊंगा एक्सप्रेस’ पकड़के चला नहीं गया, तो आप दुर्लभ हैं, आप राष्ट्रीय महत्त्व की वस्तु हैं, आपसे ज़्यादा तो टाइगर हैं देश में।

चौथा बात तो पते की कर रहा था, आपका स्मार्टफ़ोन चाहे कितनी भी डाइटिंग क्यूँ न कर ले, चाल की पतली दीवारों के सामने फ़ेल है। ऊपर से आपके “आsssह” “उssssह” “हाँजी” “बढ़िया” या जो भी आवाज़ें आप करते हैं उसपे आपके घरवालों की प्रतिक्रिया सोचने भर से आपके कम से कम दस बाल सफ़ेद हो जाएंगे।

अधिकांश भारत, एक कमरे के मकानों में गुज़र-बसर कर रहा है। अकेले महाराष्ट्र में कुछ 95 लाख लोग, एक 100 स्क्वेयर फुट के मकान में, अनारदाना बने हुए हैं । इन एक कमरे के मकानों में सात और लोगों के साथ घुसे हुए ज़िन्दगी गुज़ारने पर सवालात पहले भी खूब हुए हैं, पर किसी ने ये नहीं पूछा कि तेज़ी से बढ़ते मध्यम वर्ग के ये कबूतर, गुटर गुटर कैसे करते हैं ?

मैंने अपनी सारी ज़िन्दगी इन चालों में ही बितायी है, और दिल से बोलूँ तो शायद मैं और कहीं रहना भी नहीं चाहूँगा । इतने सारे लोगों के साथ होने से एक अलग तरह की ख़ुशमिज़ाजी होती है माहौल में। चाल के कमरों में एक ऊपर छज्जे जैसी जगह होती है, जिसे स्थानीय भाषा में “माला” बोलते हैं। जैसे ही शादी पक्की होती है, सबसे पहले और कभी कभार तो खाने का मेनू और दहेज निश्चित करने के पहले, इस तहखाने की मरम्मत, पुताई का काम होता है, नया गद्दा बिछाया जाता है और पर्दा लगाया जाता है। ऐसा समझ लीजिये जैसे ट्रेन की साइड अप्पर बर्थ पे नवविवाहित जोड़ा रात को सफ़र कर रहा है और परदे के पीछे इत्मिनान से चरम-आनंद प्राप्त कर रहा है।

इस लेख के आखिर में मैं अपनी बात करना चाहूँगा, मैंने अभी तक आपको बताया कि मेरा मोहल्ला कैसे रातें रंगीन कर रहा है, पर मेरा क्या? जिस पीढ़ी का मैं हिस्सा हूँ, वो पली-बढ़ी तो ऐसे ही घरों में है, पर इस दकियानूसी सोच को पीछे छोड़ आयी है।

बस एक छोटी सी दिक्कत है। पर्दे आपको उत्सुक आँखों से तो बचा लेते हैं, पर आवाज़ कैसे रोकें? ऊपर से जिस लकड़ी से ये मचान बनी है उसके चरमराने का भी खतरा है । परिवार वाले इन आवाज़ों को सुनकर भी अनसुना कर देते हैं, जैसे कुछ हो ही न रहा हो, पर बाजू वाली मंजू आंटी का क्या? उनकी आँखें धारावाहिक पर हैं लेकिन कान नहीं। आपको पता है कि दूसरों को पता है कि आप कर रहे हैं, पर अब करना तो है । ऐसे में आपके पास माहौल गरम करने का वक़्त नहीं है, सीधा काम की बात पे आइये। लेकिन इस काम को अंजाम देने के बाद जब आप गैलरी में नज़र चुराते हुए बाहर आएँगे तो आप चाहे जितने मर्ज़ी कपड़े पहन लें, लोगों को आप नंगे ही दिखेंगे।

अगर आपकी किस्मत ख़राब हुई और आपकी आँखें मंजू आंटी से दो चार हो गयीं, तो वो आपकी आत्मा की गहराई खड़े खड़े नाप देंगी, वो ऐसे देखेंगी मानो कह रही हों, “मुझे पता है तुमने करा है अभी, ज़्यादा देर टिका नहीं ना, फिर भी मज़ा तो आया रहेगा” ।

ऐसे में घरवालों को आपके संघर्ष पर दया आ जाती है और वो घूमने या किसी रिश्तेदार से मिलने के बहाने आपको थोड़ा एकांत देते हैं। क्योंकि अधिकतर युवक नौकरीपेशा होते हैं तो उनको सप्ताह के अंत में काम से छुट्टी होती है। ऐसे में आपकी भावनाओं की इज़्ज़त (हालात पर तरस) करते हुए घरवाले ऐसी योजनाएं बनाते रहते हैं। ये सब शादी के कुछ 2 -3 महीनो तक चलता रहता है, फिर बहाने कम पड़ने लगते हैं और घरवालों को भी कहीं न कहीं लगने लगता है कि जितना उनसे बनता था उतना किया, अब जोड़े को भी समझना चाहिए। इसका मतलब आसपास की सुन्दर जगहें देखने की बारी आपकी है, जिनके नाम ‘श्वर’ या ‘ला’ से ख़त्म होते हैं। दरअसल आप बाहर जाते हैं माहौल बदलने। माहौल मतलब गद्दा और चद्दर। एक नयी चद्दर और गद्दा आपको एक कारण देते हैं इस कार्य को करते रहने का, वर्ना वैसे ही आप दो दिन में वापिस अपने कबूतरखाने में लौटने वाले हैं। फिर कुछ दिन बाद आपके बच्चे हो जाएंगे, उसके बाद वैसे ही सब बंद।

इस लेख के आखिर में मैं अपनी बात करना चाहूँगा, मैंने अभी तक आपको बताया कि मेरा मोहल्ला कैसे रातें रंगीन कर रहा है, पर मेरा क्या? जिस पीढ़ी का मैं हिस्सा हूँ, वो पली-बढ़ी तो ऐसे ही घरों में है, पर इस दकियानूसी सोच को पीछे छोड़ आयी है। पर हमारे परिवार न तो अपना कान हमसे हटाएंगे, न वो मुझे अपना बिस्तर ऐसी मुलाक़ातों के लिए इस्तेमाल करने देंगे। इसलिए मुझे जब भी सेक्स नसीब हुआ है, मैं हमेशा दूसरे शख़्स के घर ही गया हूँ । अब मैं कहता ही नहीं हूँ, “तुम्हारे यहाँ चले या मेरे यहाँ”, बल्कि दबी आवाज़ में बस गुज़ारिश करता हूँ, “क्या तुम्हारे यहाँ चल सकते हैं”। मैं ये इतनी बार कह चूका हूँ की सोच रहा हूँ इसे अपने टिंडर और फ़ेसबुक विवरण में डाल दूँ।

खैर एक दिन मुझे भी घरवालों के दबाव में झुककर एक बहु घर लानी पड़ेगी । तब मेरा क्या होगा? क्या मुझे अपना घर सॉउन्डप्रूफ़ कराना होगा? या किसी बजट होटल में कमरा लेना होगा? आशा करता हूँ ऐसा कुछ भी न करना पड़े। उम्मीद है कि भविष्य में मेरे पास एक ढंग का फ़्लैट और खुद का एक बैडरूम होगा, जिसकी दीवारें मोटी होंगी, जिससे मंजू आंटी मेरी सेक्स ध्वनियों से वंचित रह जाएंगी और मैं कितनी देर तक टिकता हूँ जाने बिना ही उन्हें दुनिया से जाना होगा।

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