लिबरल मेरी जान, क्या अंग्रेज़ी ही तेरी ज़ुबान ?

Social Commentary

लिबरल मेरी जान, क्या अंग्रेज़ी ही तेरी ज़ुबान ?

Illustration: Sushant Ahire

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998 में एक अंग्रेज़ी फिल्म आयी थी – बॉय मीट्स गर्ल, जिसमें एक अंग्रेज़ी-भाषी नौजवान को एक इटैलियन-भाषी लड़की से इश्क़ हो जाता है। न लड़के को इटैलियन आती है, न लड़की को अंग्रेज़ी, पर कहानी में उन दोनों का अपनी भाषा की इस अपंगता पर बहुत समय तक ख्याल ही नहीं जाता।

खैर, ये दोनों तो प्यार में थे और प्रेम की कोई भाषा नहीं होती। पर मैं जिनकी बात करने जा रहा हूँ, उनको प्यार छोड़िये, एक दूसरे का नाम तक गवारा नहीं है। जिन्होंने अनुमान लगा लिया उनकी दूरदर्शिता को बधाई, आप ही हैं जो iPhone आने के पहले उसके फीचरों का घोड़ा व्हाट्सएप्प पर दौड़ा देते हैं। मैं राइट-विंग समुदाय और उनका विरोध करने वाले उदारवादी यानि लिबरल समुदाय की बात कर रहा हूँ।

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ये दोनों समुदाय अलग अलग भाषाओं में बात करते आये हैं। पारंपरिक तौर पे राइट-विंग समुदाय अपनी बात मुख्यतः हिंदी में रखता आया है, और उदारवादी अंग्रेजी में। पर भाषा के फर्क को समझने से पहले कोशिश करते हैं इनके सोचने के तरीके में फर्क को समझने की।

क्योंकि राइट-विंग समुदाय अपने मतभेद ज़ाहिर करने में भावनाओं को तर्कों से ज़्यादा महत्व देते हैं, गुस्सा, गर्व, और घृणा उनकी वाणी का अहम हिस्सा हैं। जिसके कारण उदारवादी उन्हें अपने से काम आंकते आये हैं और ऐसे कई मौके हैं जब उदारवादियों ने उनकी ख़राब अंग्रेज़ी और सीमित तार्किक क्षमता का न सिर्फ माखौल उड़ाया है, बल्कि उन्हें अनपढ़ इत्यादि बोल कर कटु व्यंग्य भी कसे हैं।

पहले दोनों पक्ष अपने विचार रखने और दूसरे के विचारों को समझने के लिए पारंपरिक माध्यमों जैसे टीवी, रेडियो, अखबारों इत्यादि पर निर्भर थे। पर सोशल मीडिया ने सब कुछ बदल के रख दिया। अब आप किसी भी ख़बर पर सीधा टिप्पणी कर सकते हैं, मन की बात कह सकते हैं। कितना बढ़िया मेल-जोल का साधन खुल गया, नहीं? न चिट्ठी लिखनी किसी को, न किसी अख़बार के ऑफिस फ़ोन लगाना न किसी रिपोर्टर का इंतज़ार करना जो आपका इंटरव्यू ले… जैसे समझ आये, महसूस हो, लिख दो।

पर पिछले दिनों पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या पर जिस तरीके की भद्दी टिप्पणियां, ज़्यादातर हिंदी-भाषी राइट-विंग समुदाय के लोगों ने करी हैं, उदारवादी उसके समक्ष मजबूर दिखाई दिए। ऐसा नहीं है कि उन्होंने आवाज़ नहीं उठायी: अपने अपने स्तर पे मोर्चे निकाले, बोलने की स्वतंत्रता पर लेख लिखे, और कोशिश की ये बतलाने की, कि किसी शख़्स की मौत को सार्थक ठहराना न सिर्फ निराशाजनक है, बल्कि एक घटिया काम है। पर वो भी सीधा शास्त्रार्थ से बचते हुए दिखाए दिए।

रवीश ने फिर भी कोशिश करी कि जितने पोस्ट का जवाब दे सकें दें, पर फिर भी उस लेख के टॉप कमेंटेटर तोते ही हैं।

ऐसा क्यों है कि राजनैतिक पार्टियों की IT सेल द्वारा चलाये गए रटे-रटाये प्रचार सन्देश जिनमे अफवाह, झूठ, और बे-सर-पैर की बातों का लड्डू बाँटा जाता है, पर लोग ज़्यादा भरोसा कर रहे हैं? बजाये कि उदारवादियों के स्पष्ट, जोड़े हुए तर्कों पे?

उदारवादियों की भाषा को पढ़ने और समझने में जितनी मेहनत एक सामान्य हिंदी पाठक को करनी पड़ती है, उसकी तुलना में सीधा-साधा, भावनाओं से भरा हुआ व्हाट्सएप्प का झूठ अपनाना उन्हें कहीं प्यारा लगता है। सीधा सा उदाहरण देता हूँ। मान लीजिये आपको जलेबी नहीं पसंद। अब आपकी सोशल मीडिया फीड में बात चल रही है कि जलेबी बहुत स्वादिष्ट होती है। पर ये बात जिस भाषा में कही जा रही है वो भाषा आपको ठीक से आती नहीं; जब बोलते हैं तो हंसी का पात्र बन जाते हैं, और दूसरा आपकी उस पहलू को जानने में ख़ास रूचि भी नहीं है।

निष्कर्ष! चला दिया अंगूठा ऊपर, स्क्रॉल हो गया पेज नीचे, और आप पहुँच गए वहाँ जहाँ लिखा है जलेबी तो खराब चीज़ है। अब क्या, आपने कर दिया उस पर क्लिक।

अब आपको उस लेख के अंत में बोल दिया जाये की जो लोग यह सन्देश फैला रहे हैं कि जलेबी स्वादिष्ट है, उनको कमेंट कर के फलाना जवाब लिखना चाहिए। तो आपने वो सन्देश कॉपी किया और धन्न से दे मारा उस अंग्रेजी लेख के नीचे। अब सामान्य पाठक के इर्द-गिर्द घूमने वाली ट्रोल आर्मी इस सन्देश को हिंदी, अंग्रेजी, तेलगू, कन्नड़ या जहां भी जलेबी की फोटो तक दिखी, वहाँ अपना परचा बाँट देगी। क्योंकि एक कमेंट मतलब एक हिन्दू जीवन, जिसको एक जलेबी नेस्तोनाबूत करने में तुली है।

गौरी लंकेश के बारे में एक अफवाह चल रही थी कि वह ईसाई हैं, इसलिए उन्हें जलाया नहीं बल्कि दफनाया गया है, और उनके जर्नल के नाम में जो “पत्रिके” आता है, वो दरअसल अंग्रेज़ी का “पैट्रिक” है। कुछ रवीश कुमार सरीखे विनम्र और आत्मीय लोगो ने इस झूठ के गड्ढे को भरने की ठानी और एक लेख में इसका स्पष्टीकरण किया। उन्होंने बताया कि गौरी लिंगायत समुदाय की थीं, और आगे उन्होंने लिंगायत समुदाय में दफनाए जाने की पूरी विधि को एक साधारण विकिपीडिया पेज की जानकारी की तरह बता दिया। पर लोगों को जलेबी दिख गयी तो उन्होंने हिंदी, वह भाषा जो उनकी अपनी है, उसे पढ़ना तक ज़रूरी नहीं समझा और सीधा कॉपी पेस्ट ठोक दिया। रवीश ने फिर भी कोशिश करी कि जितने पोस्ट का जवाब दे सकें दें, पर फिर भी उस लेख के टॉप कमेंटेटर तोते ही हैं।

एक बात स्पष्ट है कि IT सेल की इस एस्पिरिन को लेने से राइट-विंग अनुयाइयों के सर दर्द ठीक हो न हो, वो उसे खाते रहेंगे क्योंकि उदारवादियों, आपकी दवा पे जो लिखा है वो तो पढ़ने में ही नहीं आ रहा।

आज ऐसे 13 राज्य हैं जिनके मुख्यमंत्री बीजेपी से हैं। इन मे से सात राज्यों में मुख्य रूप से हिंदी बोली जाती है। बिहार, जहाँ पे नितीश ने भी बीजेपी के साथ सरकार बना ली, को जोड़ कर हैं आठ। इन आठ राज्यों के लोगों के जनादेश में कहीं न कहीं पिछली सरकारों द्वारा हिंदी को दोयम दर्जे की भाषा समझा जाना एवं उसकी उपेक्षा करना शामिल है।

ये आँकड़े इंटरनेट की दुनिया में और भी रोचक हैं। एक गूगल-केपीएमजी सर्वे के अनुसार भारत में सन 2021 तक 20 करोड़ हिंदी इंटरनेट-यूज़र होंगे, यानी कुल यूज़र बेस का 38%। भारत में गूगल के वाईस-प्रेज़िडेंट, राजन आनंदन का कहना है, “हर नया व्यक्ति जो ऑनलाइन आ रहा है, 10 में से 9 बार वो अंग्रेज़ी में कुशल नहीं होता। इसीलिए भारत में इंटरनेट प्रयोग में वृद्धि नॉन-अंग्रेज़ी यूज़र से ही आएगी।”

हिंदी बोलने वाले अब इंटरनेट के मॉल में पहले से अधिक घूमते दिखेंगे। उदारवादी यदि हिंदी को सिर्फ, “हाँ भैया लोकेशन पे आ जाओ” या “किधर है ऑर्डर, निकला अभी तक की नहीं?” या “100 का पेट्रोल डाल दो” तक ही सीमित रखेंगे, तो दोनों अलग वर्णों में तब्दील हो जाएंगे। फ़ासला उतना हो जाएगा जितना एक ज़माने में आम आदमी की भाषा और संस्कृत बोलने वाले विद्वानों में था। उन विद्वानों को तो धर्म का आश्रय था, तो यज्ञ कर के, दो श्लोकों का अर्थ बता के, दक्षिणा ले के अपनी व्याख्या समाप्त कर लेते थे। पर उदारवादियों, तुम्हारा यज्ञ कहाँ है?

सनसनी, आमसूत्र, और हिंदी फिल्मों के डायलाग के आगे भी हिंदी है। आपको उनके विचारों से दिक्कत है, तो उसे उनकी भाषा में बताना होगा, या नहीं माने तो झगड़ना होगा। और इस बहस की सफलता इस बात से नहीं तय की जाएगी कि कौन सा पक्ष ज़्यादा खरे तर्क दे पाता है। बल्कि सफलता का मापदंड होगा कि दोनों पक्षों को ये झगड़ा कितना करीब ला पता है।

आज नहीं तो कल, फैसला उदारवादियों को करना ही होगा, कि वो कौन सा रास्ता चुनते हैं। अंग्रेज़ी में त्रुटियाँ निकाल के भाषा का पैगम्बर बनने का, या एक कठिन मगर सार्थक रास्ता चुन अपने विपक्ष से उनकी भाषा में मतभेद ज़ाहिर करने का।

रेड्डिट पर एक छोटा सा समुदाय है, चेंज माय व्यू, जिसका मतलब है, मेरा नज़रिया बदलो। लोग यहाँ आकर अपना एक विश्वास दुनिया के सामने रखते हैं और बाकी लोग बिना उनका मज़ाक उड़ाये या उन पर कटाक्ष कसे उनको समझाने की कोशिश करते हैं। रवीश कुमार सालों से कर रहे हैं, विनोद दुआ की जन गण मन की बात इसका जीता-जागता सबूत है, और लल्लनटॉप चैनल है जिसकी लोकप्रियता दिन-बर-दिन बढ़ रही है। इन लोगों के तर्कों की धार हिंदी में होने से कतई कम नहीं हुई है।

तो आप अगर इस लेख में यहाँ तक पहुंचे हैं तो शुरुआत हिंदी को जगह देने की हो चुकी है, बाकी जनता, आप कब स्विच कर रहे हैं?

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