सास बहू और स्क्रीनप्ले: एक टीवी लेखिका की आपबीती

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सास बहू और स्क्रीनप्ले: एक टीवी लेखिका की आपबीती

Illustration: Akshita Monga

‘रा

धा पे तरस नहीं आ रहा यार। अभी भी उसका साथ देने वाले बहुत लोग हैं। ऐसा लग रहा है छुट्टियों पे आयी है। उसे दर्द पहुँचाना है… परेशान करना है !’

रोमा यह कहते-कहते चौथा चॉक्लेटी लड्डू भी निगल गयी। मैं उसकी गोल मटोल शक्ल को शून्यभाव से देख रही थी, फिर अचानक वो कुर्सी से उठी और अपना क्लासिक माइल्ड्स का डब्बा लेकर कमरे में घूमने लगी, इसका मतलब है कि मुलाक़ात अब ख़त्म हो चुकी है।

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मैं रोमा से जब दो महीने पहले मिली थी तो भारत के एक बड़े हिंदी मनोरंजन चैनल की कार्यक्रम मुखिया होने के नाते उसने मुझसे कहा था – ‘कुछ नया लिख के लाओ। हम कुछ हटके करना चाहते हैं, सास-बहू की वही घिसी-पिटी कहानी नहीं। किसी ऐसी लड़की की कहानी जो आगे बढ़ना चाहती है, और बड़े सपने देखती है, बड़े मतलब छोटे शहरों की लड़की के हिसाब से बड़े, ज़्यादा बड़े नहीं, पर बड़े, तुम समझ रही हो न ।’

मुझे उसकी बातों में एक आशा की किरण दिखी। मैंने कहा ‘आगे बढ़ना चाहती है? ‘दिया बाती’ वाला आगे जहाँ एक आईपीएस अफसर लड़की एक हलवाई से शादी कर लेती है, या ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ वाला आगे जहाँ एक अंधी बहू

घर के सारे काम करती है, जिसमें अपने बच्चे को बॉर्नविटा पिलाना और एक बेहद तेज़ चाक़ू से आलू छीलना भी शामिल हैं।’

रोमा ने सिगरेट के धुंए के गुब्बारे के बीच में से मुझे देखा और बोली ‘अरे वैसे नहीं। हॉलीवुड। आधुनिक सोच वाली नारी’ ।   

मेरी आशा की किरण अब इच्छाधारी नागिन की नागमणि से ज़्यादा चमकदार और समझदार हो चुकी थी। मैंने घर पहुंचकर अपना लैपटॉप खोला और एक साधारण लड़की की छोटी सी कहानी लिख डाली जो अपने सपने साथ लिए मेरठ से चल पड़ती है एक सच्चे प्यार और एक अच्छे जीवन की तलाश में। एक प्रेरित कर देने वाली कहानी जिसके अंत में उसकी शादी एक ऐसे आदमी से नहीं होती जो अपनी बीवी से नफरत नहीं करता और न ही उस पर हाथ उठाता है।  

पर आज दो महीने बाद जब मैं रोमा से मिली तो उस धुंए की दुकान ने मुझे ऐसी तरस भरी आँखों से देखा जैसे मैंने सविता भाभी लिख दिया हो । उसने मेरे कन्धों पर अपने भारी भरकम हाथ रखे और मुझे समझाते हुए बोली, ‘स्वीटी, ये साधारण लड़की की कहानी कोई नहीं देखेगा’। मैंने सोचा इसको ज़रा याद दिलाया जाये कि पिछली बार हमारी क्या बात हुई थी, पर वो अपने धुंए के गुब्बारों में मदहोश शायद ये सोच रही थी कि इच्छाधारी नागिन के साथ विज्ञापन कौन सी गोरी त्वचा वाली क्रीम का जाएगा।  

खैर, मैंने पुरानी कहानी को घसीटकर ‘क्यों लिखती हो ये सब’ नामक फोल्डर में बंद कर दिया और नए सिरे से शुरुआत की।  

राधा मेरठ से दिल्ली आती है काम की तलाश में, पर किसी तरह उसकी शादी हो जाती है एक अमीर खानदान में और उसका पति परायी औरतों में खास रूचि लेता है। ये कहानी है उसकी अपनी सास से लड़ाई की, जिसके अंत में उसके बेरूख़े पति को भी उससे प्यार हो जाता है। ये लिखने के बाद सच में मेरा मन किया कि मैं अपने कलम की नोंक से अपनी दोनों आँखें फोड़ लूँ पर फिर मैंने अँधेरी के उस फ्लैट के बारे में सोचा जिसकी कई किश्तें ऐसी ही कहानियों से पूरी हुईं थीं और कलम धीरे से वापिस नीचे रख दी।  

मुझे पूरा यकीन है कि किसी अदृश्य स्याही से इन सभी टीवी चैनलों की दीवारों पर जहां ऐसी मुलाक़ातें होती हैं, लिखा हुआ है कि, ‘बेचारी लड़की और बदचलन लड़की की लड़ाई में जीत हमेशा बेचारी लड़की की ही होती है जो आखिर में अपने बुरे ससुराल वालों को ठीक करके एक किफ़ायती बहू बन जाती है’। हर धारावाहिक इसी नुस्ख़े पर चल रहा है। आधा चमच्च अच्छी बेटी में स्वादनुसार बुरी सास मिला दीजिये या एक कढ़ाई हरामज़ादे पति में चुटकी भर अच्छी सास, पर स्वाद हमेशा किफ़ायती बहू की जीत का ही आएगा।

यहाँ टीवी की दुनिया में लेखकों से आते ही दो सवाल पूछे जाते हैं, पहला, ‘एक लाइन में बताओ कि बहू का दर्द क्या है ?’, दूसरा ‘बहू के दर्द का सबसे बड़ा कारण कौन है ?’ । सच तो ये है कि काम करने वाली आत्मनिर्भर लड़कियों के अरमानो की कहानियों से किसी को रत्ती भर फ़र्क नहीं पड़ता है । हमें यहाँ घुसते ही सिखा दिया जाता है कि अगर सास थोड़ा और कमीनी, बॉस ज़रा और हरामी, पड़ोसी कुछ ज़्यादा दखलन्दाज़ और परिवार वाले हद से ज़्यादा आलोचनात्मक होंगे तो इन सबको एक बिना सिर-पैर की कहानी में मिलाकर एक लज़ीज़ पकवान बनता है, ‘टी.आर.पी.’ ।  

नारीवादी मानसिकता और स्त्रियों के लिए बराबर अधिकार को यहाँ ‘क्रांतिकारी’ मानकर इसका भूत आपके शुरुआती दिनों में ही भगा दिया जाता है, क्योंकि टी.आर.पी. आज है कल नहीं। ऐसे ही वास्तविकता से दूरी बनाये रखने के सख़्त आदेश दे दिए जाते हैं।  जैसे ही आप इसके आसपास दिखे तुरंत एक टिप्पणी आएगी, ‘प्रेमचंद नहीं बनाना है।’। मैं ऐसी जगह काम करती हूँ जहाँ प्रेमचंद एक गाली है और रचनात्मकता रोज़ आत्महत्या करती है।

इस टी.आर.पी. की चाह के पीछे एक जबर्दस्त ताकत है।  जिसे किसी ने नहीं देखा, किसी ने नहीं सुना। इस रहस्यमयी  चीज़ का नाम है ‘भारतीय दर्शक’ । मैंने इस भारतीय दर्शक के बारे में सोच-सोच के अपने कई बाल सफ़ेद कर लिए और आखिर में ये निष्कर्ष निकाला कि दर्शक मेरी कामवाली सरिता है।

इसी मोक्ष में, मैंने रोमा की ‘प्रगतिशील’ राधा, जो एक छोटी सी फैक्ट्री चलाती है और जिसका हरामज़ादा पति रोहित, दूसरी औरतों के साथ रासलीला में लिप्त है, के लिए एक दृश्य लिखा।

सरिता की मांगे ऑटो यूनियन से थोड़ी सी ज़्यादा हैं, अच्छी बात ये है कि वो हड़ताल नहीं शिकायत करती है।  तो एक बार मुझे उसके पसंदीदा धारावाहिक पे काम करने के लिए बुलाया गया। ये धारावाहिक ख़राब रेटिंग की मार से जूझ रहा था और मरम्मत का काम मुझे सौंपा गया। लेखकों की पूरी टीम को निकाल दिया गया था और मुझसे लोग आस लगाए बैठे थे कि मैं कुछ जादू करुँगी और सब बदल जाएगा। मैंने अपनी टोपी से सुझाव फेंकने शुरू किये – चुड़ैल की एंट्री, सास का क़त्ल, हीरो की अचानक मौत और नए हीरो की एंट्री। अचानक सबके सब नए हीरो वाले सुझाव पर उत्तेजित होते दिखे, दरअसल अभी जो हीरो काम कर रहा था उसके कई चोंचले थे, मसलन उसे बारिश में कोई सीन इसलिए नहीं करना था क्योंकि उसके बाल जो किसी दूसरे जगह से लाये गए थे उनको टैंकर के पानी से नुकसान पहुँचने का खतरा था। चैनल के ई.पी. की आँखों में चमक आ गयी, उसने कहा, ‘इस बार कोई सेक्सी हीरो लेके आओ, अक्खड़ और रुख़ा किस्म का’ ।  

पर सरिता को ये सुझाव बिलकुल पसंद नहीं आया।  

सरिता: दीदी, अभी अभी तो उसका पति टपका है, अभी वो दूसरे मरद की बाहों में अच्छी लगती क्या?

मैं: पुरानी बात है। चार महीने बीत चुके हैं, और ये नया लड़का उसको कितना प्यार भी तो करता है।  

मेरी बेटी (बीच में अपनी नाक घुसाते हुए): अगर नया वाला उससे प्यार करता है तो उसके बाल क्यों खींचे थे? ऐसा कर सकता है वो? आपने कहा था कि औरतों के साथ ऐसा करना गलत है।  

मैं: तुम्हे ये सब देखने को मना किया है ना । और हाँ किसी को किसी के ऊपर हाथ नहीं..

बेटी (बीच में वापिस अपनी नाक घुसाते हुए): आप लिख रहे हो इसलिए हम देखना चाहते थे।  

(मैंने गुस्से में केबल की तार निकाल के फेंक दी।)

मैं अपनी केबल की तार इतनी बार निकाल चुकी हूँ कि सर्विस वाले का नंबर स्पीड डायल पे ही रहता है। ये जिस ईपी की मैं बात कर रही हूँ वो सिंगल है और पर्पल लिपस्टिक में विशेष रूचि लेती है। हाल ही में इसने धारावाहिक के कुछ कामुक दृश्यों को न सिर्फ पसंद किया बल्कि मुझे और कामुक, और उत्तेजक दृश्य लिखने के लिए प्रोत्साहित भी किया। गणपति की आरतियों के बीच पूजा वाले कमरे में बैठे-बैठे मैंने ठरकी लड़ाइयों के दृश्य लिखे, जिसमें पूरे जोश में आटा गूँथा जा रहा है। सरिता, खुले में हो रहे हवस के इस नाच का विरोध किया करती थी। पर मैं सरिता की भावनाओं की क़द्र करती या ई.पी. की। इस द्वन्द्व में मैंने एक बार फिर केबल की तार निकालकर फेंक दी ।

पर अब, अब मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता। अब मैंने मोक्ष पा लिया है। अब मैं किसी भी तरह के सुझाव जैसे, ‘उस बन्दे को कसकर थप्पड़ मारने दो बंदी को अगर वो नहीं समझे तो’ कोआसानी से हज़म कर लेती हूँ। कोई बहस नहीं। मैंने अब मान लिया है कि पुरुष औरतों को लात मारने और गाली देने से लेकर उनकी आपत्तिजनक तसवीरें इन्टरनेट पर फैलाने तक सब कुछ कर सकते हैं; सास अपनी बहू के सारे कपडे जलाकर राख कर सकती है और उसकी बहू की बनायीं हुई खीर में छिपकली डाल सकती है। मैंने सीख लिया है कि टीवी पर सेक्स मतलब ‘एक दूसरे को देखना’ जिसमें लड़की और लड़के की टक्कर हर धारावाहिक में उनकी सनक दिखने के लिए होती रहेगी। जब तक अश्लील विवरण बेतुकी भावनाओं के पीछे छिपा हुआ है सब चलता रहेगा। वास्तविकता और नारीवाद को आप घर पर रख के आइये, आप बहुत आगे जाएँगे।  

इसी मोक्ष में, मैंने रोमा की ‘प्रगतिशील’ राधा, जो एक छोटी सी फैक्ट्री चलाती है और जिसका हरामज़ादा पति रोहित, दूसरी औरतों के साथ रासलीला में लिप्त है, के लिए एक दृश्य लिखा।  

***

उसे दीवार से चिपकाकर, रोहित उसके दोनों हाथ ऊपर कर देता है। फिर उसकी आँखों में आँखें डालकर वो अपने दांत रगड़ता हुआ उसे धमकाता है, ‘मैंने सौ बार तुम्हे समझाया है, तुम्हे अभी तक समझ नहीं आया ?’

उसकी मज़बूत पकड़ में दबी हुई राधा धीरे से कहती है, ‘रोहित जी, प्लीज़ आय ऍम सॉरी मगर मैं अपने निश्चय पर अटल हूँ, मैं आपको डाइवोर्स नहीं दूंगी !’

रोहित उसे गुस्से से देखता है, फ़िर उसके बाल पकड़कर उसके होठों के बिलकुल करीब आ जाता है, ‘आखिरी बार.. ये आखिरी बार मैं तुम्हे समझ रहा हूँ.. आज रात तक पेपर साइन कर दो।’

उसे ज़ोर से धक्का देकर, वो कमरे से बाहर चला जाता है..

राधा टूटकर रोती हुई ज़मीन पर गिर जाती है, पीछे से उसकी आवाज़ उसके कानों में गूंजती है, ‘रोहित जी, आपको मैं कैसे समझाओं.. कि मैं आपकी रखैल नहीं ब्याहता हूँ.. आज करवा चौथ है.. इस जनम तो क्या सात जन्मों में मैं पेपर साइन नहीं करूंगी.’ मज़बूत इरादों के साथ वो कैमरे की ओर देखती है और कहती है, ‘अपने सिन्दूर की कसम, आपको बदल के रहूंगी..’

संगीत ज़ोर शोर से ऊँचा होता जा रहा है और कट।  

***

मन ही मन गिनते हुए कि इसके मुझको कितने पैसे मिलने वाले हैं, मैंने चैनल को एक और स्क्रीनप्ले ईमेल कर दिया, उस आवाज़ को किनारे करके जो मुझे निरंतर अच्छा लिखने को बोलती रहती है। अगले दिन जब एपिसोड चल रहा था, मैं सरिता की ओर देख रही थी। वो खुश थी।

 

अनुवाद: गगनजीत सिंह

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