सीटों का गुंडाराज

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सीटों का गुंडाराज

Illustration: Mudit Ganguly

सु

बह 7:24 की चर्चगेट जाने वाली लोकल में नालासोपारा से चढ़ने का अनुभव कुछ ऐसा है, जैसे आपको एक गरमा-गरम मालिश मिल रही हो। पर कोमल हाथों से नहीं, पसीने में सने घने बालों वाले हाथों से। ऐसा लगता है सब एक विशालकाय आटे में गूँथे जा रहे हों, पर आपको अंदर कोई नहीं चाहता। आपके पास ज़्यादा विकल्प नहीं हैं, सिवाय बची कुछ जगह में किसी तरह समाने के, या दरवाज़े पर लटककर अग्निपथ कहलाने के।

मुझे दोनों से ही दिक्कत थी, तो मैंने किसी शुभचिंतक की बात मानी और “उल्टा चढ़ो” का नारा अपना लिया। मैंने जब ये पहली बार सुना था तो मुझे कतई नहीं लगा था कि इसके वो मायने होंगे जिनसे मैं आज भी इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ। खैर, इसका मतलब होता है कि आपको जिस तरफ जाना है उससे उलटी दिशा में ट्रेन पकड़ो, ताकि जब वो वापस आ रही हो तो शायद आपको सीट मिल जाये। अगर आपको ये सुनने में अटपटा लग रहा है तो आप इस शहर से वाकिफ़ नहीं हैं जिसका नाम मुम्बई है, यानि आप हमारे मेहमान हैं। आपका स्वागत है।

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मैंने सोचा क्यों न आज़मा के देखा जाये, तो मैं घुस गया एक डब्बे में। मेरे साथ सफ़र करने वालो॓ में से थे गुज्जु व्यापारी, कॉलेज के छात्र, एक भिखारी और कई गंदे बदबूदार आदमी जो अपने साथ कारखानों और ऑफिस की गंधों का इत्र लेकर घूम रहे थे। हालाँकि कुछ सीटें खाली थीं, पर लोग उन पर बैठ नहीं रहे थे, वो उसके आस पास एक घेरा-सा लगाकर यूँ खड़े थे मानो वहां कुछ ऐसा रखा हुआ है जो नग्न आँखों से नहीं दिख सकता। मैं ऐसी ही एक खाली सीट की ओर बढ़ा, और जैसे ही वहां तशरीफ़ रखने के लिए मैंने अखबार को बाजु किया, मेरे कंधे पर एक हाथ ने दस्तक दी।

मैं पीछे मुड़ा, तो मुझसे किसी ने पूछा कि क्या मैं विरार जा रहा हूँ? मैंने कहा, “नहीं तो” और सोचा कि मैं विरार जा रहा हूँ या कहीं और, इसका इस सीट पर बैठने से क्या लेना देना हो सकता है? मैं जल्द ही कुछ सीखने वाला था। उस भीड़ के गुत्थे से आवाज़ आयी, “सीट रिज़र्व्ड है, तुमको उठना पड़ेगा।” रिज़र्व्ड, वो भी लोकल में? मैंने तो कभी नहीं सुना था, मैंने ताव में कह दिया, “मैं नहीं उठ रहा।” इस बार उन्होंने थोड़ा धमकी वाले लहज़े में कहा, मैंने भी ऊँची आवाज़ में कहा, “जा, नहीं उठेगा।”

एक पांच फुटिया पिद्दी – जिसका नाम मुझे याद नहीं तो फ़िलहाल उसे कल्पेश बुलाएंगे – मुझ 150 किलो के इंसान को उठने को कह रहा है, तो मैं कैसे उठ जाऊँ?

उनकी तरफ़ से लड़ने वाले पता नहीं कहाँ से आते ही जा रहे थे, और मैं यहाँ अकेला, अपने उसूलों के साथ डटा हुआ था।

कल्पेश का साथ एक मोटी नाक वाले बुज़ुर्ग चाचा भी दे रहे थे, जिन्होंने मुझे उठाने के लिए एक अलग रास्ता अपनाया। उन्होंने कहा, “ये सीट हमारे ग्रुप वालों के लिए रखी है”, और इस सीट को छोड़ के मैं कहीं भी बैठ सकता हूँ। मैंने इस बार उनका विनम्रतापूर्वक प्रस्ताव ये कहकर ठुकरा दिया की अगर अखबार, बस्ते, और रूमाल का मतलब रिज़र्व्ड है, तो मेरे पास ज़्यादा विकल्प नहीं हैं। चाचा ने कहा उनका रोज़ का आना-जाना है और वो लोग यहीं बैठते हैं और ऐसे ही काफ़ी वक़्त से चलता आया है। पर मैंने ध्यान नहीं दिया।

कुछ देर और परेशान करते रहने पर मैंने चाचा, कल्पेश, और वहां मौजूद हर शक़्स जो मेरी तरफ़ देख रहा था, को कह दिया कि चाहे जो हो जाये, मैं यहाँ से नहीं हिलने वाला। मेरी तशरीफ़ ये सीट छोड़कर कहीं और नहीं जाएगी, मैंने खुद से एक वादा किया। जैसे ही ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी, इनकी टीम में एक हट्टा-कट्टा नौजवान भी शामिल हो गया, जो इनसे कहीं अधिक कमीना दिख रहा था। इसको हम “गला गुल” बोलेंगे, क्योंकि इसका चेहरा ठीक वहां से शुरू होता था जहाँ कंधे ख़त्म होते थे।

ट्रेन रुकी और जैसे बांध खुलने पर पानी उमड़ के बाहर निकलता है, वैसे ही ढेरों शरीरों का एक सैलाब डब्बे में दाखिल हुआ। गुजराती, मारवाड़ी, और जैन यात्री अपने नए मित्रों की खुशामदीद करने में लग गए, वहीं एक और जमावड़ा दरवाज़े के पास इकठ्ठा हो गया, जिससे अब डब्बे में आवजाही मुश्किल हो गयी। पर मैं और गला-गुल अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए थे।

उनकी तरफ़ से लड़ने वाले पता नहीं कहाँ से आते ही जा रहे थे, और मैं यहाँ अकेला, अपने उसूलों के साथ डटा हुआ था। काश मेरे उसूल दो-चार गालियॉँ भी देना जानते, पर मुझे अपने और मेरे उसूल दोनों के हिस्सों की गालियॉँ खानी और देनी दोनों पड़ रही थी। अचानक सब शांत हो गए। एक चश्मे वाला अधेड़ उम्र का आदमी जो शक्ल से अकाउंटेंट या केशियर मालूम होता था, मेरे पास आकर टूटी-फूटी अंग्रेजी में बोला, “ये जगह हमारी है। तुम यहाँ बैठोगे, तो तुम्हे ही दिक्कत होगी।”

मुझे लग रहा था कि अब हाथापाई निश्चित है। मेरे दिमाग में लड़ाई का पूरा दृश्य साफ़ था। मैं ब्रूस ली की तरह पहले चाचा को धक्का देकर साइड में करता, फिर कल्पेश को एक थप्पड़ और अकाउंटेंट को ज़ोर से एक मुक्का मारकर, गला गुल से द्वन्द्व के लिए तैयार हो जाता। पर उसके बाद क्या? और कितने लोगों से मैं अकेला लड़ लेता? मैंने अपनी व्यावहारिक बुद्धि से काम लिया और अभिमान का एक कड़वा घूँट पीकर, अकाउंटेंट को कहा, “पर मैं कहाँ बैठूँ फिर?” तभी अकाउंटेंट के चेले चपाटों में से एक ने सीट खाली कर दी।

गला गुल और चाचा, ज़ोर ज़ोर से अपनी जीत का टुनटुन बजाने लगे, “अच्छे से बोला तो नहीं समझा।” मेरे दिमाग में आया कि अब अगर मैं अपनी टेढ़े मोहल्ले की परवरिश पर जाता हूँ तो भले ही सीट मिले या न मिले, इनको थोड़ी खुराक ज़रूर मिलेगी। पर मैं कहीं मीरा रोड और दहिसर के बीच था, अकेला, और संख्या में उनसे कहीं कम। मैं उनको शिकायत करने की धमकी देकर अपनी नई सीट पर जाकर बैठ गया। अकाउंटेंट ने हँसते हुए कहा, “जा, तेरे से पहले भी बहुत लोग हैं, तू भी कर आ।”

थोड़ी देर बाद अकाउंटेंट के चेले शांत हो गए और रम्मी खेलने लगे। गला गुल और चाचा बीच-बीच में मुझे अपनी कमीनी आँखों से देख लेते थे; कल्पेश कभी कभार मुझ पर गुजराती में एक जोक मारता जिसपर सब हँस लेते, पर अँधेरी आते-आते उनका समूह एक भीड़ का हिस्सा बनकर रह गया। बस दो समूह बचे थे, एक बुड्ढों का, दूसरा लैमिंगटन रोड के कुछ दुकानदारों का। (उनकी बातें सुन कर आप बता सकते थे कि वो मदरबोर्ड और ग्राफ़िक कार्ड से कितना प्यार करते हैं।)

मैं अपने स्टॉप पर पूरे जोश में उतरा, कि अब जाकर इनकी शिकायत लगाऊँगा। इरादा ये था कि वहां जाकर क्लेश करूँगा। आखिर टिकट लेकर चढ़ा था, मेरे भी कोई अधिकार हैं। पर मुझे पता था, 75 लाख यात्रियों, जेबकतरों, नशेड़ियों, और छेड़छाड़ करने वालों के बीच मेरी शिकायत कुछ ऐसे सुनाई देगी, “प्लीज़ मेरी मदद कीजिये, मेरी गुल्लक से पैसे चोरी हो गए।”

मैं शिकायत करने गया तो पुलिस स्टेशन खाली था, वहां जो लोग होने चाहिए वो या तो सी.आइ.डी. देखने गए थे या काउंटर स्ट्राइक खेलने। मुझे तभी एक ख्याल आया की मान लिया ट्रेन में सीटों का गुंडाराज है, पर ऐसा तो मेरी भी बार में पसंदीदा जगह है और आज शाम कोई उल्लू का पट्ठा वहां भी बैठा होगा।

पर इस क्रूर प्रतियोगिता में, या तो आप अपनी जगह पकड़ के रखते हो या उसे किसी और के हाथ जाता देख सकते हो। तो जो भी आज मेरी सीट पर बैठा है, सुन ले – लक्ष्मी में ऊपर शीशे के बाजु वाली सीट मेरी है साले।

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